रांचीः कैसा रहा दिशोम गुरुजी का राजनीतिक सफर….

झारखंड की राजनीति के कद्दावर जननेता शिबू सोरेन ने 1960 के दशक में घर छोड़ कर अपने पैरों पर खड़ा होने का निर्णय लिया, तो सबसे पहले पतरातू-बड़काकाना रेल लाइन निर्माण के दौरान उन्हें कुली का काम मिला, लेकिन जब उन्होंने मजदूरों के लिए विशेष तौर पर बने बड़े-बड़े जूते पहने, तो शिबू सोरेन ने कहा यह काम वे नहीं कर सकते है।

इसके बाद उन्होंने राजनीति और समाज सेवा का मन बनाया। सबसे पहले शिबू सोरेन बड़दंगा पंचायत से मुखिया का चुनाव भी लड़ा, लेकिन वे हार गये, बाद में जरीडीह विधानसभा सीट से भी चुनाव लड़े, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। शराबबंदी, मुनाफाखोरी और महाजनी प्रथा के खिलाफ जनआंदोलन की शुरुआत की। शिबू सोरेन ने संथाल सुधार समिति का गठन किया और क्षेत्र में महाजनी प्रथा, नशा उन्मूलन और समाज सुधार तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष अभियान चलाया।

बाद में संथाल सुधार समिति ने आदिवासी सुधार समिति का रूप धारण कर लिया और फिर ए.के. राय, विनोद बिहारी महतो के संपर्क में आने के बाद इसका स्वरूप और वृहद हो गया तथा झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ। जेएमएम गठन के बाद अलग राज्य गठन का आंदोलन शुरू हुआ, साथ ही आदिवासियों विशेषकर संथाल परगना क्षेत्र में शिबू सोरेन को लोग दिशोम गुरू मानने लगे।

तीन बार केंद्र में व तीन बार मुख्यमंत्री रहे, कभी कार्यकाल पूरा नहीं

शिबू सोरेन को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में 2004 में कोयला मंत्री बनाया गया, लेकिन इस बीच बहुचर्चित चिरूडीह नरसंहार मामला उजागर होने और अदालत द्वारा गैर जमानती वारंट जारी होने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से 24जुलाई 2004 को इस्तीफा दे देना पड़ा। बाद में जमानत पर रिहा होने पर उन्हें 27 नवंबर 2004 को फिर कोयला मंत्रालय की जिम्मेवारी सौंपी गयी।

पहली बार शिबू सोरेन 2 मार्च 2005 को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन बहुमत सिद्ध नहीं हो पाने के कारण 11 मार्च 2005 को ही उन्हें इस्तीफा दे देना पड़ा। इसके बाद पुनः केंद्र में मंत्री बने। इसी दौरान 28 नवंबर 2006 को दिल्ली की एक अदालत ने शशिनाथ झा हत्याकांड मामले में शिबू सोरेन को आजीवन कारावास की सजा सुनायी, जिसके बाद फिर उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। भारत के इतिहास में संभवतः पहली बार किसी केंद्रीय मंत्री को अदालत द्वारा हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा सुनायी गयी।

बाद में उन्हें ऊपरी अदालत से न्याय मिला और वे दोषमुक्त करार दिये गये। केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को बचाने में अहम भूमिका निभाने के बाद शिबू सोरेन 27 अगस्त 2008 को दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने, लेकिन 11 जनवरी 2009 को तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में हार के उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

बाद में 2009 के दिसंबर महीने में विधानसभा चुनाव होने के बाद शिबू सोरेन तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन इस बीच लोकसभा में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पक्ष में वोट करने से राज्य में सरकार की सहयोगी भाजपा के आला नेता उनसे नाराज हो गये और शिबू सोरेन सरकार से बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया।

आठ बार लोस व तीसरी बार रास के लिए हुए निर्वाचित

जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन आज राज्यसभा के लिए तीसरी बार निर्वाचित हुए है। इससे पहले 1998 में वे एकीकृत बिहार में पहली बार आरजेडी के समर्थन राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे, बाद में वर्ष 2002 में भाजपा के समर्थन से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और करीब दो महीने तक सांसद रहने के बाद लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। शिबू सोरेन दुमका लोकसभा सीट से 1980,1989, 1991, 2002, 2004 और 2009 तथा 2014 में भी निर्वाचित रहे है, लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा प्रत्याशी सुनील सोरेन से चुनाव हार गये थे, जिसके कारण पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में भेजने का निर्णय लिया।