रांची। पिछले 22 साल से राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे झारखंड की जनता को इस बार फिर इंतजार है कि आखिर इस चक्रव्यूह को कैसे तोड़ा जा सकेगा।

झारखंड में शह और मात का खेल जारी, जनता को इंतजार कौन किसपर पड़ेगा भारी !

चक्रव्यूह तोड़ने की जिम्मेदारी किसकी !

रांची। पिछले 22 साल से राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे झारखंड की जनता को इस बार फिर इंतजार है कि आखिर इस चक्रव्यूह को कैसे तोड़ा जा सकेगा। 22 साल के इस झारखंड में लंबा समय गठबंधन की सरकारों के साथ बीता है। इस बार भी महागठबंधन की सरकार लगभग तीन साल से हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चल रही है। गठबंधन के अंदरखाने की लड़ाई ने एक बार फिर राज्य को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से यह तय कर पाना शायद ही किसी राजनीतिज्ञ के पास हो, जो इस चक्रब्यूह को तोड़ सके। गठबंधन के अंदरखाने की आपसी कलह, अति महत्वाकांक्षा और सरकार के हर विधायकों का अलग-अलग एजेंडा एक बार राज्य के लोगों को सोचने पर मजबूर कर  दिया है कि आखिर राजनीति क्या इसी तरह से चलती है। लगातार बनती-बिगड़ती राजनितिक परिस्थितियों पर अब सभी भी निगाहें राजभवन से लेकर चुनाव आयोग और उन जांच एजेंसियों की तरफ है, जो राज्य में भ्रष्टाचार और आपराध में मामलों की तहकीकात कर रहे हैं।

ऐसे मौके पर झारखंड में विपक्षी पार्टी बीजेपी और आजसू ने सरकार के खिलाफ मोर्चा तो खोल ही दिया है, लेकिन सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों इस बात को साबित नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर कहां किसकी  गलती है, जिसका खामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है।अगर विस्तार से झारखंड की राजनातिक को समझने की कोशिश की जाए तो एक साथ कई ऐसे सवाल खड़े हो जा रहे हैं, जिससे हर कोई कन्फ्यूज हो रहा है कि आखिर कौन सही है और कौन गलल। इस खबर से हम कोशिश करेंगे कि वर्तमान परिस्थितियों को सामने रखा जाए, जिससे जनता भी आकलन करे कि आखिर उसके राज्य को कौन कहां ले जा रहा है।

गठबंधन की सरकार कहीं बड़ी मुसीबत तो नहीं !

पहला सवाल खड़ा होता है राज्य में इस बार नई सरकार यानि कि लगभग तीन साल पहले हेमंत सोरेन के नेतृत्व में कांग्रेस और आरजेडी के साथ माले के समर्थन से बनी महागठबंधन की सरकार का। सरकार बनने के साथ ही विश्वव्यापी कोरोना के दंश के बीच दो साल सरकार ने किसी तरह से निकाल तो लिए, लेकिन अपने सहयोगी दलों के विधायकों और नेताओं की अति अपेक्षा ने सरकार को लगातार कमजोर करने का काम किया। सरकार में शामिल जेएमएम और कांग्रेस के कई विधायकों ने अपनी ही सरकार पर कई तरह के सवाल खड़े करने लगें, जिसका फायदा विपक्षी पार्टी को राजनीतिक रूप से मिलने लगा। कांग्रेस और जेएमएम के की विधायकों ने पद पाने की लालसा में अपनी ही सरकार के खिलाफ चिंगारी सुलगाने में लग गए। अंदरखाने में जब आग की तपिश महसूस होने लगी तो विधायक चुनावी एजेंडे और जनहित के मुद्दों को सामने रखकर अपनी पद की लालसा को छुपाने की जरुर कोशिश की । इसी कड़ी में कई विधायक राज्य में विपक्षी पार्टी बीजेपी के नेताओं के संपर्क में आकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की कोशिश जरुर की। इसी का नतीजा हुआ कि कांग्रेस के तीन विधायक कोलकाता में नकद राशि के साथ पकड़े गए। हालांकि इसके मास्टरमाइंड को जनता भी ढूढ रही है। इसका पटाक्षेप होना अभी बाकी है।

विपक्षी पार्टी लगातार हावी, दाव-पेच के खेल जारी

दूसरा सवाल तब खड़ा हुआ जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुबर दास और बीजेपी विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने  मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ साथ उनके परिवार के सदस्यों और गठबंधन में शामिल पार्टी के नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए राजभवन से लेकर, जनता तक सरकार पर सवाल खड़े हुए। इसमें वर्तमान में ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके छोटे भाई विधायक बसंत सोरेन का नाम सुर्खियों में आया। चुनाव आयोग में मामले की सुनवाइ के बाद जब फैसले की घड़ी आई तब बीजेपी के नेताओं ने अपने राजनीतिक स्टंट को तेज कर दिया। इस स्टंट में मीडिया भी तब कूद गई जब लगा कि झारखंड में कोई बड़ा राजनीतिक भूचाल आनेवाला है। मजेदार बात तो तब सामने आई जब सत्ताधारी दल भी बीजेपी के स्टंट और मीडिया की आशंकाओं वाली रिपोर्ट के आधार पर बड़े कदम उठाने शुरू कर दिए। अटकलों के बाजार के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने सारे दाव खेलना तेज कर दिया।

एक तरफ जहां चुनाव आयोग, राजभवन और इस तरह की बाकीं संस्थाओं को एक मैसेज देनी की कोशिश की, वहीं विपक्षी पार्टी की स्टंट का भी व्यहारिक और राजनीतिक रूप से जवाब दिया। सरकार की सभी सहयोगी पार्टियों के शीर्ष नेताओं से हेमंत सोरेन ने सीधे सवाल किया कि क्या राज्य में गठबंधन की सरकार चलानी है या नहीं। इसपर सभी दल के शीर्ष नेता एकजुट होकर सामने आ गए। कांग्रेस और जेएमएम के बाकी बन रहे विधायकों के सामने में सांप –छुछुंदर वाली स्थिति पैदा हो गई। लेकिन इस सारे घटनाक्रमों के बीच हेमंत सोरेन ने एक तीर से कई शिकार कर डाले। हेमंत ने जहां संवैधानिक संस्थाओं को अपना मैसेज देने का काम किया, वहीं विपक्षी पार्टी को भी संदेश दिया कि सरकार एकजुट है। साथ ही साथ गठबंधन में शामिल कुछ बागी बन रहे विधायकों के गले में भी रस्सी बांध दी। पहले सीएम हाउस  में बैठकों का दौर जारी रहा, पिकनिक और रायपुर की यात्रा से सभी विधायकों को एकजुट करने में सफलता हांसिल की और फिर मॉनसून सत्र के बने एक दिन की कार्रवाही को सामने लाकर विधिवत अपना गद्दी बचाते हुए महागठबंधन से बहुमत सिद्ध करा लिया। राजनीतिक जगत में इसे हेमंत का मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह रही है, जो भी कदम अधिकारिक रूप से उठाए गए, वो ना तो संवैधानिक संस्थाओं, राजभवन और ना ही राज्य की विपक्षी पार्टी बीजेपी की तरफ से उठाए गए। पूरे घटनाक्रम में स्वतः ही सरकार ने लगातार कार्रवाई कर डाली।

जांच एजेंसियों पर सवाल उठाना कितना जायज !

तीसरे पहलू की बात की जाए तो झारखंड में इन दिनों सीबीआई और ईडी की टीम की तरफ से कई मामलों की जांच जारी है। इडी की जांच के क्रम में  जिस तरीके से कार्रवाई हुई है, उसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के करीबी माने जानेवाले पंकज मिश्रा, के साथ साथ अमित अग्रवाल से भी ईडी की टीम पूछताछ कर रही है। हालांकि मामले-अलग-अलग जरुर हैं, लेकिन राज्य में सत्ताधारी दल, विपक्ष और जानकार इस बात की चर्चा जरुर कर रहे हैं कि जांच की आंच बड़े लोगों पर भी आ सकती है। हालांकि राज्य की सत्ताधारी पार्टियां इन जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़ी कर रही है, लेकिन विपक्षी पार्टी सारे जांच के कार्य को संबंधित लोगों पर लगे आरोप और उससे जुड़ती कड़ियों को मान रही है। यानि की बीजेपी का मानना है कि जांच में उनकी पार्टी का कोई हस्ताक्षेप नहीं है।

बहरहाल झारखंड के 22 साल होने को हैं। अभी तक राज्य के गठन के समय तय किए गए उद्देश्यों को लेकर जो सवाल खड़े हो रहे हैं, उसका जवाब किसी भी राजनीतिक पार्टियों के पास नहीं दिखाई पड़ रहा है। राज्य में राजनीति कर रही सभी बड़ी पार्टियों को कभी ना कभी राज्य में सरकार चलाने का मौका जनता ने जरुर दिया है, लेकिन सरकार बनने के बाद खुलकर किसी भी पार्टी की तरफ से राज्य गठन के उद्देश्यों और इसकी दशा और दिशा को दुरुस्त करने की हिम्मत नहीं दिखाई जा सकी है।

राज्य में ज्वलंत मुद्दे, जिसका जवाब सभी राजनीतिक पार्टियों से जनता जानना चाह रही है –

  • झारखंड राज्य में पांचवी अनुसूची के तहत कार्य कैसे हो।
  • आदिवासी और मूलवासी को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए कैसे कार्य होगे
  • राज्य में डोमेसाइल नीति स्पस्ट कैसे किया जा सकेगा।
  • राज्य में आरक्षण की पॉलिसी क्या होगी।
  • राज्य में रोजगार को लेकर किस तरीके से कार्य किया जा सकेगा।
  • सीएनटी-एसपीटी एक्ट को कारगर बनाना या उसमें कोई नया एमेंडमेंट करना कैसे होगा
  • राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में जमीन संरक्षण को लेकर किस तरीके से कार्य किए जा सकते हैं।
  • विस्थापन और पलायन को रोकने के लिए नीतियों पर कदम कैसे बढ़ेगा
  • बुनियादी सुविधाओं में- भोजन, स्वास्थय, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं को अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचेगा
  • गरीबी और बेरोजगारी के लिए किस तरीके से योजनाएं बनाई जा सकेगी
  • नक्सलवाद और उग्रवाद के खात्मे के लिए जनता का भरोसा कैसे जीता जा सकेगा।
  • बाहरी-भीतरी के विवाद को किस तरीके से सामंजस्य के साथ खत्म किया जाए।
  • धर्म को लेकर लगातार बढ़ती दूरियां को कम करने के लिए क्या किए जाएं।