संकट की घड़ी में ऑनलाइन शिक्षा कितना सही, जानें क्या हैं राह में चुनौतियां
- By admin --
- 26 Jul 2020 --
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21वीं शताब्दी में अभी तक की सबसे बड़ी समस्या या काल के रूप में सामने आए कोरोना वायरस ने आज सम्पूर्ण विश्व को हिला कर रख दिया है। इस वायरस ने ना केवल किसी देश के लोगों के स्वास्थ्य पर प्रहार किया है। बल्कि इसने किसी देश की रीढ़ समझे जाने वाली अर्थव्यवस्था , शिक्षा, रक्षा और स्वास्थ्य विभागों तक को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है।
24 मार्च से 3 मई 2020 तक लगाये गए इन 40 दिन की अवधि के लॉकडाउन में सारे विद्यालय, कॉलेज व अन्य उच्च शिक्षा संस्थान बंद पड़े हैं। ऐसे में इसका सीधा असर अध्यापकों और विद्यार्थियों के जीवन पर पड़ा है।
केवल छात्र ही नहीं , उनके अविभावक भी अपने बच्चों के करियर को लेकर चिंतित हैं । कई महत्वपूर्ण उच्च परीक्षाएं भी टाल दी गयी है जिसमें दिल्ली उच्च न्याययिक सेवा मेन जैसी परीक्षाएं भी शामिल हैं । शिक्षा विभाग ने आदेश जारी करते हुए नर्सरी से लेकर आठवीं तक , नौंवी और ग्यारहवीं कक्षा के सभी विद्यार्थियों को बिना पेपर दिए ही पास कर दिया है।
बच्चे को चार से पांच घंटे मोबाइल लेकर बैठना पड़ता है
वैसे तो कहा जाता है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें, लेकिन अभी बच्चे को पढ़ाई के लिए ही मोबाइल इस्तेमाल करना पड़ रहा है। उसके बाद वो टीवी भी देखता है तो उसका स्क्रीन टाइम बढ़ गया है। इसका बच्चे की सेहत पर क्या असर होगा।
आजकल माता-पिता कुछ ऐसी ही दुविधा से दो-चार हो रहे हैं। बच्चे को पढ़ाना भी ज़रूरी है, लेकिन उसकी सेहत भी अपनी जगह अहम है। साथ ही बच्चा कितना समझ पा रहा है, ये भी देखना ज़रूरी है।
दरअसल, कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते मार्च से ही स्कूल बंद कर दिए गए हैं। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि स्कूल कब से खुलेंगे और नया सिलेबस कब शुरू हो पाएगा।
बच्चे ये क्लासेस मोबाइल या लैपटॉप पर वीडियो कॉल के ज़रिए ले रहे हैं जिससे उन्हें एक लंबे समय तक स्क्रीन देखनी पड़ती है और उनका स्क्रीन टाइम बढ़ जाता है।
क्या कहते हैं मनोरोग विशेषज्ञ
मनोरोग विशेषज्ञों कहना है कि ऑनलाइन क्लास में जो पढ़ाया जा रहा है बच्चे उसे कितना समझ पा रहे हैं, जैसे कि सामान्य तौर पर नॉर्मल अटेंशन स्पैन 20 से 30 मिनट होता है यानी कोई भी व्यक्ति इतनी ही देर तक काम पर अच्छी तरह फ़ोकस कर सकता है।अगर बच्चे या किशोर छह या सात घंटे से ज़्यादा स्क्रीन पर रहते हैं तो उन पर मनोवैज्ञानिक असर हो सकता है ।
ऑनलाइन क्लासेस ने बच्चों को एक रूटीन दिया
कुछ डॉक्टर मानते हैं कि मानते हैं कि ऑनलाइन क्लासेस ने बच्चों को एक रूटीन दिया है जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।वो कहते हैं, स्कूल ना खुलने से बच्चों का समय बर्बाद नहीं हो रहा है। एक सकारात्मक दिशा में जा रहा है। माता-पिता ने देखा होगा कि ऑनलाइन क्लास के बिना बच्चे देर से सो रहे थे और देर से जग रहे थे और उनका पूरा रूटीन बदल गया था। लेकिन, ऑनलाइन क्लास होने से अब उनकी दिनचर्या ठीक रहेगी। उन्हें व्यस्त रहने के लिए सही काम मिलेगा।
फिर एक बात ये है कि अभी कोई नहीं जानता कि स्कूल कब खुलने वाले है।अगर इसमें बहुत देरी होती है तो आगे चलकर बच्चों पर ही स्लेबस पूरा करने का दबाव आएगा। ऐसे में उनकी मुश्किल बढ़ जाएगी। इससे अच्छा है कि थोड़ा-थोड़ा करके अभी से ही आगे बढ़ें।
डिजिटलीकरण दौर की मांग व जरूरत है ऑनलाइन क्लास
इस ऑनलाइन क्लास में भी दो तरफा संचार की सुलभता होंने से अध्यापकों व छात्रों के बीच विद्यालय और कॉलेज जैसा ही संपर्क हो पा रहा है। ऑनलाइन क्लास आज के डिजिटलीकरण दौर की मांग व जरूरत है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि इससे जो छात्र कक्षा में शर्म के कारण प्रश्न नही पूछ पाते है, वे ऑनलाइन माध्यमों के जरिये अपनी समस्या खुलकर पूछ लेते है।
छात्रों ने समझा ऑनलाइन क्लास की महत्ता
कुछ विशेष कोर्स की ऑनलाइन फीस सस्ते होने से ज्यादा छात्र इसका अधिक लाभ उठा पा रहे है। लॉकडॉउन होने से ऑनलाइन क्लास की महत्ता को छात्र अधिक समझ पाने में सक्षम हुए है। लॉकडाउन की स्थिति में शिक्षा स्तर पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को ऑनलाइन क्लासों ने बहुत कम कर दिया है।
नकारात्मक पक्ष को भी नहीं किया जा सकता है नजरअंदाज
लेकिन इस ऑनलाइन शिक्षा के कई नकारात्मक पक्ष भी हैं, जिसे हम दरकिनार नहीं कर सकते। हम उन छात्रों की दास्तान नहीं समझ सकते जिनके घरों में एकांत तो नहीं ही है और प्राथमिक जिम्मेदारी पढ़ाई भी नहीं है। घंटों ऑनलाइन मोबाइल के साथ अकेले बैठकर पढ़ने की स्थिति कितने घरों में है?
उन दूर दराज के इलाकों में इस ऑनलाइन को कैसे देखेंगे, जहां अभी बिजली और सड़क भी नहीं पहुंचे। जिन घरों में यह सब है भी उनमें भी क्लासरूम की सामूहिकता और एकाग्रता का माहौल बन सकता है क्या? नहीं बन सकता। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा वर्तमान संकट की घड़ी में ‘मजबूरी में जरूरी’ तो हो सकता है, पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकल्प बिल्कुल भी नहीं हो सकता.
कुछ लोग ऑनलाइन शिक्षा में सामाजिक भेदभाव को देख रहे हैं.। उनका तर्क है कि पिछड़े तबके के पास स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, डेटा, आदि नहीं है, इसलिए वे ऑनलाइन के लाभ से वंचित रह जाएंगे।