राष्ट्रपति चुनाव के बहाने क्या झारखंड में बनेगी डबल इंजन की सरकार !

राकेश कुमार (पत्रकार)

रांची। भारत देश में राष्ट्रपति का चुनाव शायद ही कभी इतना चर्चा का विषय बना हो। अमूमन हर बार राष्ट्रपति के चुनाव में आम लोगों को बाद में पता चलता था कि किसे राष्ट्रपति चुना गया है। लेकिन इस बार 2022 में जब एनडीए ने आदिवासी महिला डॉ द्रोपदी मुर्मू को प्रत्याशी बनाया तो जैसे लगा कि आम जनता ही अब चुनाव में वोट डाल सकेंगी। लगे हाथ यूपीए की तरफ से भी बड़ी बैठक कर पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री (भाजपा के कार्यकाल में ) यशवंत सिन्हा को मैदान में उतार दिया गया। अब राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर इतती बहस शायद पहले ही कभी हुई होगी। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलों की राय सामने आने लगी। सोशल मीडिया पर चुनावी कंपेन जैसा माहौल भी दिखाई पड़ने लगा। लेकिन यूपीए की विचारधारा वाली कई पार्टियों में डॉ द्रोपदी मुरमू के नाम पर सहमति जता कर राजनीतिक माहौल को और भी चर्चित कर दिया है।

अब झारखंड में महागठबंधन की सरकार जहां जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी के समर्थन से चल रही है, वहां भी डॉ द्रोपदी मुर्मू के नाम को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। आखिर अब यहां भी राजनीति तो करनी ही है। सत्ताधारी दल जेएमएम ने द्रोपदी मुर्मू के पक्ष में मत देने की घोषणा कर अपने गठबंधन की पार्टियों को सकते में डाल दिया है। जेएमएम सुप्रीमों शिबू सोरेन ने पत्र जारी कर द्रोपदी मुर्मू को समर्थन देने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही अब राज्य की राजनीति में भी कई तरह की चर्चा तेज हो गई है।

अक्सर राज्य के मुखिया केंद्र सरकार के खिलाफ आग उगलते नजर आते थे, लेकिन अचानक परिवर्तन दिखाई पड़ने लगा है। हेमंत सोरेन ने पहले केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात की और इसके बाद जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देवघर दौरा हुआ तो वे प्रधानमंत्री और बीजेपी के नेताओं के समर्थन में कसीदे कसते नजर आए। बहरहाल राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर राजनीतिक पार्टियां अपनी भूमिका निभाने में लगी है। लेकिन 22 साल के इस झारखंड को अभी भी राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में ही देखा जा रहा है।

भले ही बहाना राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए प्रत्याशी को समर्थन देने का है, लेकिन इसके पीछे कई राज दिखाई पड़ रहे हैं। जानकारों का मानना है कि केंद्र की बीजेपी सरकार झारखंड जैसे राज्य में अपनी पकड़ कायम रखने की दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। इधर राज्य के विकास को लेकर जेएमएम और कांग्रेस के गठबंधन से कई अड़चने भी आती नजर आ रही है। ऐसे में सभवत: राज्य में फिर से एक पहले से आजमाया हुआ समीकरण दिखाई पड़ सकता है। जो शायद 28-28 महीने के कार्यकाल के दौरान दिखाई पड़ा था।

वैसे झारखंड जैसे राज्य जहां देश के कुल खनिज संपदा का 40 प्रतिशत खनिज मौजूद है। ऐसे में इस राज्य की भूमिका देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करने में कारगर माना जाता रहा है। परंतु अस्थिर और दो विचारधारा की सरकार का असर यहां के विकास पर पड़ा है। ऐसे में शायद इस दिशा में अब राजनीतिज्ञ सोचने लगे हैं कि अगर डबल इंजन की सरकार बने तो शायद राज्य का कायाल्प हो जाए। इस दिशा में भी कार्य तेजी से चल रहे हैं।

इधर राज्य सरकार की सहयोगी पार्टी कांग्रेस के कई विधायकों और नेताओं से राज्य सरकार के मुखिया परेशान रहे हैं। कांग्रेस के सरकार के प्रति विरोध वाले सुर के साथ साथ कई मुद्दों पर अलग-अलग राय हेमंत सोरेन की सरकार को सोचने पर मजबूर कर रही है। ऐसे में सूबे के मुखिया एक सात कई उलझनों से गुजर रहे हैं। सामने झारखँड जैसे राज्य, जो उनके पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन का सपना रहा है, वहीं सब कुछ रहते हुए अपने पिता और जनता के सपनों को पूरा नहीं कर पाने का मलाल। अक्सर मुख्यमंत्री को सकते में डालता रहा है। कई बार कई मंच से हेमंत सोरेन ने इस ओर इशारा भी किया है। शायद अब उन्हें भी इस बात की समझ आ रही है, कि बतौर मुख्यमंत्री उनके सामने किस तरीके की चुनौतियां है, जिससे निपटने के लिए उन्हें खउद आगे आना होगा। तभी तो केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात और प्रधानमंत्री का झारखंड दौरा उनके लिए अंलग अंदाज में दिखाई पड़ा है।

अब राष्ट्रपति के चुनाव और राज्यसभा चुनाव के बहाने ही सही जेएमएम ने अपने सहयोगी पार्टियों को कुछ संदेश और संकेत दोनों दो दिए हैं। हालांकि सबकुछ राजनीति में खुलकर बोला भी नहीं जाता है। ऐसे में  राज्य में राजनीतिक भविष्य क्या होगा, इसपर अभी चर्चा जारी है।