Naxal Surrender: हथियार छोड़ने के बाद भी गांव वापसी की राह मुश्किल

Naxal Surrender: हथियार छोड़ने के बाद भी गांव वापसी की राह मुश्किल, ग्रामीणों के विरोध से नई चुनौती

रांची: हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने वाले कुछ पूर्व नक्सलियों के सामने अब एक अलग तरह की चुनौती खड़ी हो रही है। आत्मसमर्पण के बाद जब ये लोग अपने गांव लौटने की कोशिश कर रहे हैं, तो कुछ जगहों पर ग्रामीण इन्हें स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं। ग्रामीणों की नाराजगी का कारण उनके पुराने दौर से जुड़ी घटनाएं और उन पर कायम अविश्वास बताया जा रहा है।

ग्रामीणों का तर्क है कि हिंसा के दौर में जिन लोगों पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाकर कार्रवाई की गई, उनके परिवारों को नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में आत्मसमर्पण के बाद पुराने लोगों पर दोबारा भरोसा करना उनके लिए आसान नहीं है।

सुकमा में भी सामने आई ऐसी समस्या

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में भी आत्मसमर्पण करने वाले कुछ नक्सलियों के सामने गांव में वापस लौटने को लेकर इसी तरह की परेशानी सामने आने की बात कही गई है। सुकमा एसपी मयंक गुर्जर ने बताया कि कुछ सरेंडर किए हुए नक्सलियों को गांव वालों की ओर से इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ा है।

पुलिस के अनुसार, ग्रामीणों और पूर्व नक्सलियों के बीच बातचीत के जरिए इन विवादों को दूर करने की कोशिश की जा रही है। प्रशासन का प्रयास है कि आत्मसमर्पण कर चुके लोग दोबारा हिंसा की राह पर न जाएं और सामान्य जीवन में लौट सकें।

रोजगार के जरिए पुनर्वास की कोशिश

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली अब हथियार नहीं उठाने की बात कह रहे हैं। वे चाहते हैं कि उन्हें अपने गांव और समाज में दोबारा जगह मिल सके।

पुलिस और प्रशासन की ओर से इनके पुनर्वास और रोजगार को लेकर भी प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि रोजगार उपलब्ध होने से आत्मसमर्पण कर चुके लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट कम किया जा सकता है और उन्हें सामान्य जीवन जीने का अवसर मिल सकता है।

हालांकि, पुनर्वास की प्रक्रिया केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। गांव में सामाजिक स्वीकार्यता और स्थानीय लोगों का भरोसा हासिल करना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में सामने आ रहा है।

पुराने जख्मों के कारण भरोसे का संकट

जिन इलाकों में लंबे समय तक नक्सली हिंसा का असर रहा है, वहां ग्रामीणों और पूर्व नक्सलियों के बीच पुराने विवाद और घटनाएं अब भी प्रभाव डाल रही हैं। जिन परिवारों ने हिंसा के दौर में नुकसान झेला है, उनके लिए आत्मसमर्पण के बाद किसी पूर्व नक्सली को स्वीकार करना तुरंत संभव नहीं हो सकता।

इसी वजह से पुलिस प्रशासन बातचीत के जरिए ग्रामीणों की नाराजगी दूर करने की कोशिश कर रहा है। अधिकारियों का मानना है कि संवाद के माध्यम से धीरे-धीरे भरोसा कायम करने की दिशा में काम किया जा सकता है।

झारखंड में कुछ नक्सली समूह अब भी सक्रिय होने का दावा

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, झारखंड में अभी 20 से 25 नक्सलियों के एक-दो समूह के बचे होने की जानकारी है। अधिकारियों का कहना है कि इन समूहों से संपर्क साधकर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करने की कोशिश की जा रही है।

पुलिस की रणनीति में पहले आत्मसमर्पण के लिए संपर्क और बातचीत का प्रयास शामिल है। अधिकारियों के मुताबिक, अगर हथियारबंद समूह पुलिस बल पर हमला करते हैं, तो सुरक्षा बल जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं।

आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में लौटना चुनौती

पुलिस का कहना है कि हथियार छोड़ने के बाद पूर्व नक्सलियों को सामान्य जीवन में वापस लाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें रोजगार, पुनर्वास और समाज में दोबारा स्थान दिलाने जैसे पहलू शामिल हैं।

वहीं, ग्रामीणों का भरोसा जीतना इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। आत्मसमर्पण करने वाले लोगों के लिए चुनौती केवल हथियार छोड़ना नहीं, बल्कि पुराने संबंधों और विवादों के बीच सामान्य सामाजिक जीवन दोबारा शुरू करना भी है। प्रशासन अब बातचीत के माध्यम से इस दूरी को कम करने की कोशिश कर रहा है।

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