एक ऐसा मेला पर अंधविश्वास, जहां मंत्री अगर किया उद्घाटन तो चली जाती है गद्दी !

दुमका। झारखंड में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की कई एतिहासिक कहानियां हैं। सतालपरगना के इतिहास में हूल क्रांति को लेकर जहां वीरता की गाथा की चर्चा होती है, वहीं कई गाथाएं ऐसी हैं, जो सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करती है। ऐसा ही एक मेला इस तथ्यों और इतिहास का गवाह बनता है- संतालपरगना का हिजला मेला, जिसे अब जनजातीय हिजला मेला के नाम से जाना जाता है।

दुमका के मयूराक्षी नदी के किनारे प्रकृति की गोद में बसा हुआ है यह इलाका।  एक सप्ताह तक चलने वाला जनजातीय मेला की शुरुआत  1890 मे  संथाल परगना के डिप्टी ब्रिटिश कमिश्नर आर कस्टेयस ने की थी . करीब 128 साल पुराने इस जनजातीय मेला के संबंध में कहा जाता है  कि 1855 हु ये मे संथाल हूल क्रांति के बाद कस्टेयर्स ने आदिवासियों  से खोई हुई विश्वास और ब्रिटिश हुकूमत के प्रति बढ़ी हुई दूरियों को मिटाने के लिए इस मेले की शुरुआत की गई थी .

पहले यह मेला जनजाति हिजला मेला के नाम से जाना जाता था . बाद में झारखंड सरकार ने इस मेले को राजकीय दर्जा देकर मेले को गौरव और इसकी विशेषता को सामने लाने की कोशिश की। लेकिन इस मेले के आयोजन को लेकर कई तरह की अंदविश्वास भी है, जिसपर लगातार चर्ता होती रही है। कहां जाता है कि  अविभाजित बिहार के समय इस मेले का उद्घाटन एक मुख्यमंत्री ने की थी, जहां उनकी सत्ता चली गई थी . वहीं झारखंड बनने के बाद इस मेले का उद्घाटन राज्य के मंत्री ने की तो उसकी भी कुर्सी चली गई। इन दोनों घटनाओं  बाद राजनीतिक जगत से लेकर तमाम इलाके में इस बात की चर्चा तेज हो गई। इसके बाद से इस मेले के उद्घाटन के लिए कोई भी मंत्री सामने नहीं आता है।

 

दुमका में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ शुक्रवार को राजकीय जनजाति हिज़ला मेला महोत्सव का शुभारंभ किया गया. यह कार्यक्रम 7 दिनों तक चलने वाले  इस मेले को लेकर कई भ्रांतियां हैं. इसे अंधविश्वास कहें या हकीकत कहा जा सकता है  जो भी प्रतिनिधि या प्रशासन इस मेले का उद्घाटन किया करते हैं  तो उनकी सत्ता या कुर्सी चली जाती है. यही वजह  है कि इस मेले का उद्घाटन ना तो कभी मंत्री किया करते हैं और ना ही कभी जिला प्रशासन के अधिकारी ही  ऐसे में मेले का उद्घाटन ग्राम प्रधान से कराकर इससे बचकर अपनी पीठ भी थपथपाई लेते हैं .