CMPFO: 727.67 करोड़ रुपये के निवेश मामले में CBI जांच का आदेश, झारखंड हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

CMPFO: 727.67 करोड़ रुपये के निवेश मामले में CBI जांच का आदेश, झारखंड हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (CMPFO) के 727.67 करोड़ रुपये से जुड़े मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया है। गुरुवार को चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। प्रार्थियों और प्रतिवादियों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने का निर्देश दिया।

यह जनहित याचिका कोल इंप्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर की गई थी। मामला CMPFO की ओर से डीएचएफएल (DHFL) में किए गए बड़े निवेश और बाद में फंसी राशि से जुड़ा है।

DHFL में किया गया था करीब 1300 करोड़ का निवेश

जनहित याचिका में बताया गया कि CMPFO की ओर से DHFL में करीब 1300 करोड़ रुपये का निवेश किया गया था। बाद में DHFL दिवालिया हो गई, जिसके कारण निवेश की बड़ी राशि फंस गई।

याचिका के अनुसार, इस निवेश में से करीब 727.67 करोड़ रुपये की राशि वापस नहीं मिल सकी। कर्मचारियों ने भविष्य निधि से जुड़ी इतनी बड़ी रकम के निवेश और उसके फंसने को लेकर सवाल उठाए थे।

2019 में राशि वापस लेने के लिए प्रस्ताव

याचिका में बताया गया कि निवेश की राशि फंसने के बाद उसकी वसूली के लिए CMPFO की 20 दिसंबर 2019 को हुई बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया था। इसमें DHFL में फंसी रकम को वापस लेने के लिए जरूरी कदम उठाने की बात कही गई थी।

हालांकि, इसके बाद भी पूरी राशि की वसूली नहीं हो सकी। आगे चलकर मामले में फंसी रकम को लेकर एक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया।

727.67 करोड़ रुपये को राइटऑफ करने का प्रस्ताव

22 नवंबर 2021 को CMPFO के ट्रस्टी के अधीन इन्वेस्टमेंट सब-कमेटी की बैठक हुई। इस बैठक में DHFL में फंसी 727.67 करोड़ रुपये की राशि को राइटऑफ करने का प्रस्ताव रखा गया था।

राइटऑफ का मतलब ऐसी रकम को खाते से हटाने की प्रक्रिया से है, जिसकी वसूली मुश्किल या असंभव मानी जा रही हो। कर्मचारियों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई और निवेश तथा रकम के फंसने की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की।

कर्मचारियों ने निवेश प्रक्रिया पर उठाए सवाल

कोल इंप्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर जनहित याचिका में निवेश से जुड़े फैसलों और रकम फंसने के बाद उठाए गए कदमों पर सवाल उठाए गए।

याचिका में कहा गया कि CMPFO की राशि कर्मचारियों के भविष्य निधि से जुड़ी है। ऐसे में इतनी बड़ी रकम के निवेश, उसके फंसने और बाद में उसे राइटऑफ करने के प्रस्ताव की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

क्षतिपूर्ति के लिए सेस लगाने का प्रस्ताव

मामले में यह भी बताया गया कि CMPFO की राशि फंसने के बाद उसकी भरपाई के लिए कोल इंडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की ओर से कोयला उत्पादन पर 10 रुपये प्रति टन सेस लगाने का प्रस्ताव रखा गया था।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य फंसी हुई राशि की भरपाई करना बताया गया। हालांकि, कर्मचारियों की ओर से इस व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए।

हाईकोर्ट ने दिए CBI जांच के आदेश

गुरुवार को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर विस्तृत सुनवाई की। अदालत के समक्ष CMPFO के निवेश, DHFL के दिवालिया होने, राशि वापस लेने के प्रयास, राइटऑफ के प्रस्ताव और कर्मचारियों की आपत्तियों से जुड़े बिंदु रखे गए।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया है। अब निवेश से जुड़े फैसलों और 727.67 करोड़ रुपये की राशि के फंसने से संबंधित घटनाक्रम की जांच केंद्रीय एजेंसी करेगी।

यह मामला कर्मचारियों के भविष्य निधि से जुड़ी बड़ी राशि का है, इसलिए हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई जांच के नतीजों पर नजर रहेगी।

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