बिना नोटिस वेतन वृद्धि छीनी तो हाई कोर्ट ने लगाई रोक, 14 जवानों को 8 सप्ताह में मिलेगा लाभ
- By rakesh --
- 05 Nov 2026 --
- comments are disable
रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप)-8 के 14 जवानों को बड़ी राहत देते हुए उनकी वेतन वृद्धि वापस लेने और अतिरिक्त भुगतान की राशि एकमुश्त वसूलने के राज्य सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने कहा कि संबंधित जवानों को कारण बताओ नोटिस दिए बिना और उनका पक्ष सुने बिना वेतन वृद्धि वापस लेना उचित नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार को जवानों को सभी परिणामी लाभ आठ सप्ताह के भीतर देने का निर्देश दिया है।
यह मामला जैप-8 के 14 जवानों को पहले दिए गए वेतन वृद्धि के लाभ को बाद में वापस लेने से जुड़ा है। अदालत ने अपने फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और पहले पारित न्यायिक आदेशों का भी उल्लेख किया।
2021 में मिला था वेतन वृद्धि का लाभ
मामले के अनुसार, जैप-8 के 14 जवानों को एक आदेश के तहत एक अप्रैल 2021 से वेतन वृद्धि का लाभ दिया गया था। इसके बाद 11 दिसंबर 2023 को कमांडेंट की ओर से संशोधित आदेश जारी किया गया। इस आदेश के माध्यम से पहले दी गई वेतन वृद्धि वापस ले ली गई। साथ ही जवानों को अतिरिक्त भुगतान के रूप में मिली राशि एकमुश्त वसूलने का निर्देश भी दिया गया।
सरकार के इस फैसले से प्रभावित जवानों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से दलील दी गई कि पहले दिए गए वेतन वृद्धि के लाभ को वापस लेने से पूर्व उन्हें न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।
पहले के हाई कोर्ट आदेश का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ रंजन ने अदालत को बताया कि इससे पहले भी इसी तरह के मामले हाई कोर्ट के समक्ष आए थे। वर्ष 2016 और 2017 में जारी बर्खास्तगी के आदेशों को अदालत ने निरस्त कर दिया था। साथ ही राज्य सरकार को संबंधित जवानों को उनके मूल पद पर बहाल करने और सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया गया था।
अधिवक्ता ने बताया कि अदालत ने राज्य सरकार को प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच करने की छूट भी दी थी। हालांकि, राज्य सरकार ने उस आदेश को चुनौती नहीं दी। इसके बाद जवानों को वेतन वृद्धि का लाभ भी दिया गया, लेकिन बाद में बिना किसी नोटिस के इस लाभ को वापस ले लिया गया।
सरकार ने दिया ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का तर्क
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संबंधित अवधि में जवानों ने काम नहीं किया था। इसलिए ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत के आधार पर उनकी वेतन वृद्धि वापस ली गई। सरकार ने अपने पक्ष में झारखंड सेवा संहिता के नियम 85(ख) का भी हवाला दिया।
सरकार के अनुसार, इस नियम के तहत असाधारण अवकाश को छोड़कर अन्य अवकाश की अवधि को वेतन वृद्धि के लिए सेवा अवधि में शामिल किया जा सकता है। जवानों की बर्खास्तगी की अवधि को असाधारण अवकाश माना गया था। इसी आधार पर उस अवधि का लाभ वेतन वृद्धि की गणना में नहीं दिया जा सकता था।
नोटिस दिए बिना वेतन वृद्धि वापस लेना अनुचित
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि पहले के न्यायिक आदेश में जवानों को सभी परिणामी लाभ देने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार ने उस आदेश को चुनौती नहीं दी थी और उसी के आधार पर जवानों को वेतन वृद्धि का लाभ भी प्रदान किया गया था।
ऐसे में लंबे समय बाद बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और संबंधित जवानों का पक्ष सुने बिना वेतन वृद्धि वापस लेना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हितों को प्रभावित करने वाला आदेश पारित करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना आवश्यक है।
आठ सप्ताह में देने होंगे सभी परिणामी लाभ
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से जारी वेतन वृद्धि वापस लेने और अतिरिक्त भुगतान की राशि एकमुश्त वसूलने संबंधी आदेश को रद कर दिया। साथ ही सरकार को निर्देश दिया कि जैप-8 के सभी 14 जवानों को फैसले के अनुरूप आठ सप्ताह के भीतर सभी परिणामी लाभ उपलब्ध कराए जाएं। इस फैसले से लंबे समय से वेतन वृद्धि और भुगतान को लेकर परेशान जवानों को राहत मिली है।
यह भी पढ़ें: बैंक ऑफ इंडिया को 19.30 करोड़ का चूना लगाने का आरोप, रांची के दो पूर्व निदेशक भी CBI के रडार पर