Jharkhand High Court: मधु कोड़ा के मनी लॉन्ड्रिंग केस में आरोप बदलने पर हाईकोर्ट ने क्या कहा?
- By rakesh --
- 10 Oct 2026 --
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रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपों में बदलाव की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के दायरे को स्पष्ट किया। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने कहा कि आरोप में बदलाव करने या नया आरोप जोड़ने का अधिकार अदालत के पास है। फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी समय इस शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कोई आरोपी या अभियोजन पक्ष इसे अपने अधिकार के रूप में मांग नहीं सकता।
आरोपों में बदलाव के लिए रिकॉर्ड पर सामग्री जरूरी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपों में बदलाव या नया आरोप जोड़ने के लिए रिकॉर्ड पर संबंधित सामग्री का होना आवश्यक है। अदालत को मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय लेना होता है।
अदालत ने यह भी कहा कि CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल सावधानी से करता है। इस शक्ति का उपयोग अपील या पुनरीक्षण के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता। इसका उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है।
मधु कोड़ा के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान मधु कोड़ा की ओर से अधिवक्ता नवीन कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी मामले के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने आरोपों में बदलाव और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर अपनी दलीलें पेश कीं।
प्रार्थी की ओर से यह भी कहा गया कि ED की विशेष अदालत ने एजेंसी के आवेदन पर कई बार आरोपों में बदलाव किया, जबकि मधु कोड़ा की ओर से दिए गए आवेदन पर निर्णय नहीं लिया गया। उनके वकील ने CrPC की धारा 226 के अनुपालन का मुद्दा भी उठाया। ये दलीलें याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में रखी गईं।
3,600 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पर उठाए सवाल
मधु कोड़ा की याचिका में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बताई गई अपराध से प्राप्त राशि को लेकर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मूल आपराधिक मामले में दर्ज रकम और ED के मामले में उल्लेखित राशि के बीच बड़ा अंतर है।
याचिका के अनुसार, मधु कोड़ा के खिलाफ आरोपों में 1,340 करोड़ रुपये और 12.14 लाख अमेरिकी डॉलर की राशि को अपराध से प्राप्त रकम के रूप में दर्शाया गया। उनकी ओर से सवाल उठाया गया कि इतनी बड़ी राशि का मूल अपराध से सीधा संबंध किस आधार पर स्थापित किया गया है।
सीबीआई जांच में सामने आई अलग-अलग रकम
मामले की शुरुआत वर्ष 2009 में निगरानी थाने में दर्ज केस से हुई थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, निगरानी ने 28 जनवरी 2010 को लगभग 1.40 करोड़ रुपये से संबंधित मामले में आरोप पत्र दाखिल किया था। बाद में झारखंड हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ली।
सीबीआई ने 12 नवंबर 2010 को दाखिल पहली चार्जशीट में लगभग 13 करोड़ रुपये की कथित अवैध राशि का उल्लेख किया। वहीं, 21 मई 2013 को दाखिल अंतिम चार्जशीट में 8.42 करोड़ रुपये की आय से अधिक संपत्ति का जिक्र किया गया। इन्हीं आंकड़ों के अंतर को आधार बनाकर याचिकाकर्ता ने ED के मामले में दर्ज बड़ी राशि पर सवाल उठाए।
2012 से 2018 के बीच आरोपों में कई बार हुआ बदलाव
याचिका में दिए गए विवरण के अनुसार, ED के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 25 सितंबर 2012 को आरोप तय किए जाने के समय अपराध से प्राप्त राशि 3,549.72 करोड़ रुपये और 24,29,990 अमेरिकी डॉलर बताई गई थी। इसमें मधु कोड़ा के खिलाफ 1,340 करोड़ रुपये और 12,14,995 अमेरिकी डॉलर की राशि का उल्लेख था।
इसके बाद 17 सितंबर 2013 को आरोपों में बदलाव करते हुए कुल राशि 3,554.65 करोड़ रुपये बताई गई। 13 जून 2018 को यह राशि बढ़ाकर 3,633.11 करोड़ रुपये कर दी गई। बाद में भी आरोपों में बदलाव और कुछ नई कंपनियों को आरोपी बनाए जाने का उल्लेख है। याचिकाकर्ता के अनुसार, मधु कोड़ा के खिलाफ बताई गई राशि में उसी तरह बदलाव नहीं किया गया।
यह मामला आरोपों में बदलाव की मांग, अपराध से प्राप्त राशि के निर्धारण और जांच एजेंसियों की प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सवालों पर केंद्रित है। हाईकोर्ट की टिप्पणी CrPC की धारा 216 के तहत अदालत के अधिकार और उसके इस्तेमाल की शर्तों से संबंधित है।
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