बिहार के 7 नेता जो विधायक बने बिना पहुंचे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

बिहार के 7 नेता जो विधायक बने बिना पहुंचे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

पटना: बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री बनने के लिए विधानसभा चुनाव लड़ना और विधायक बनना अनिवार्य नहीं है। राज्य में ऐसे कई नेता हुए हैं, जिन्होंने विधायक बने बिना मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इनमें लोकसभा सांसद और विधान परिषद के सदस्य भी शामिल रहे। कुछ नेताओं ने मुख्यमंत्री बनने के बाद विधान परिषद की सदस्यता हासिल की, तो कुछ ने इसी सदन के माध्यम से अपना कार्यकाल जारी रखा। इन सात नेताओं की राजनीतिक यात्रा बिहार की बदलती सियासत और संवैधानिक व्यवस्था की एक दिलचस्प तस्वीर पेश करती है।

1967 के बाद बिहार की राजनीति में आया बड़ा बदलाव

1967 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में पहली बार कांग्रेस के बजाय दूसरी पार्टियों के गठबंधन की सरकार बनी। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। इसी दौर में मधेपुरा से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर आए बीपी मंडल राज्य सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनना चाहते थे।

बताया जाता है कि समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने उन्हें सांसद रहते हुए राज्य सरकार में मंत्री बनने के राजनीतिक संदेश को लेकर समझाया था। इसके बावजूद बीपी मंडल महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बन गए।

मुख्यमंत्री से विवाद के बाद बीपी मंडल ने बनाई अलग पार्टी

सांसद रहते हुए मंत्री बने बीपी मंडल को निर्धारित समय के भीतर बिहार विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना जरूरी था। इसी बीच एक तबादले को लेकर मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा और उनके बीच मतभेद बढ़ गए। समय पर विधान परिषद की सदस्यता का रास्ता नहीं निकलने के कारण बीपी मंडल को मंत्री पद छोड़ना पड़ा।

इसके बाद उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कुछ विधायकों के साथ मिलकर शोषित दल बनाया। उस समय दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं था। कांग्रेस और शोषित दल ने मिलकर महामाया सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। 25 जनवरी 1968 को सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाई और सत्ता से बाहर हो गई।

सतीश प्रसाद सिंह पांच दिन रहे मुख्यमंत्री

सरकार गिरने के बाद बीपी मंडल को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति बनी, लेकिन वह बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। विधान परिषद में तत्काल सीट उपलब्ध नहीं होने के कारण राजनीतिक स्तर पर एक अलग रास्ता निकाला गया।

28 जनवरी 1968 को सतीश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद बीपी मंडल को राज्यपाल के कोटे से विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। सतीश प्रसाद सिंह ने 1 फरवरी 1968 को पद छोड़ दिया और बीपी मंडल मुख्यमंत्री बन गए। इस घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में एक अनोखा उदाहरण पेश किया।

अब्दुल गफूर और भागवत झा आजाद भी बने मुख्यमंत्री

जुलाई 1973 में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के बीच केदार पांडेय को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद अब्दुल गफूर के नाम पर सहमति बनी। उस समय वह बिहार विधान परिषद के सभापति थे। उन्होंने 2 जुलाई 1973 को विधान परिषद का सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

फरवरी 1988 में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान के बाद बिंदेश्वरी दुबे की जगह भागवत झा आजाद मुख्यमंत्री बने। उस समय आजाद लोकसभा सांसद थे। मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए बाद में उन्होंने बिहार विधान परिषद की सदस्यता हासिल की।

सत्येंद्र नारायण सिन्हा और लालू प्रसाद यादव ने भी अपनाया यही रास्ता

मार्च 1989 में सत्येंद्र नारायण सिन्हा बिहार के मुख्यमंत्री बने। उस समय वह औरंगाबाद से लोकसभा सांसद थे। मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए उन्हें भी विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ा।

1990 में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने तो वह छपरा से लोकसभा सांसद थे। उन्होंने भी विधानसभा के बजाय विधान परिषद के माध्यम से राज्य की राजनीति में अपनी सदस्यता सुनिश्चित की। इस तरह लालू प्रसाद यादव उन नेताओं में शामिल हो गए, जिन्होंने विधायक बने बिना मुख्यमंत्री पद संभाला।

राबड़ी देवी और नीतीश कुमार की राजनीतिक राह

25 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण के समय वह किसी भी सदन की सदस्य नहीं थीं। बाद में उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता हासिल की।

नवंबर 2005 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो वह नालंदा से लोकसभा सांसद थे। मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए उन्होंने भी विधान परिषद का रास्ता अपनाया। इसके बाद वह लंबे समय तक बिहार की राजनीति के प्रमुख चेहरे बने रहे।

क्या बिना विधायक बने मुख्यमंत्री बनना संवैधानिक है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, यदि कोई मंत्री राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, तो वह लगातार छह महीने तक मंत्री पद पर रह सकता है। इस अवधि में उसे विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना होता है, अन्यथा उसे पद छोड़ना पड़ता है। बिहार जैसे द्विसदनीय विधानमंडल वाले राज्य में विधान परिषद की सदस्यता भी इसके लिए एक संवैधानिक रास्ता है।

इस तरह बीपी मंडल, अब्दुल गफूर, भागवत झा आजाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्राएं बताती हैं कि मुख्यमंत्री बनने के लिए विधायक होना जरूरी नहीं, लेकिन संवैधानिक समयसीमा के भीतर राज्य विधानमंडल की सदस्यता हासिल करना आवश्यक है।

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