बिहार में खरगे ने उठाए वोट चोरी और सामाजिक न्याय के मुद्दे, कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
- By rakesh --
- 26 Oct 2026 --
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पटना: बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा पर निशाना साधते हुए चुनाव प्रक्रिया, सामाजिक गैरबराबरी और बिहार की राजनीतिक दिशा से जुड़े कई मुद्दे उठाए। अपने संबोधन में उन्होंने भाजपा के खिलाफ संघर्ष को केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं बताते हुए इसे लोकतंत्र और वैचारिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई करार दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने आजादी की दूसरी लड़ाई का आह्वान भी किया।
खरगे के भाषण का प्रमुख केंद्र चुनाव की निष्पक्षता, सामाजिक न्याय और बिहार की समाजवादी राजनीतिक विरासत रही। कांग्रेस अध्यक्ष ने इन मुद्दों के जरिए भाजपा की नीतियों पर सवाल उठाने के साथ-साथ पार्टी के पुराने सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने का संदेश देने की कोशिश की।
वोट चोरी के आरोप और बैलेट पेपर से चुनाव की मांग
मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने बैलेट पेपर के जरिए चुनाव कराने की मांग भी की। इस मुद्दे को उठाकर कांग्रेस ने चुनावी व्यवस्था और चुनाव आयोग की भूमिका को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया।
कांग्रेस लंबे समय से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता का मुद्दा उठाती रही है। खरगे के बयान को भी इसी राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, बिहार में इन आरोपों को व्यापक जनसमर्थन में बदलना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए पार्टी को अपने सवालों को जनता के बीच लगातार उठाना होगा और उनके समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत करने होंगे।
सामाजिक न्याय और बराबरी के सवाल पर भाजपा-आरएसएस पर हमला
खरगे ने छुआछूत और सामाजिक गैरबराबरी का मुद्दा उठाते हुए भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा की आलोचना की। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
कांग्रेस इन सवालों को लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की बहस से जोड़कर अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को फिर से सक्रिय करना चाहती है। पार्टी के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है, क्योंकि सामाजिक न्याय की राजनीति बिहार में चुनावी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
हालांकि, राजनीतिक मंचों से सामाजिक बराबरी की बात करने के साथ-साथ कांग्रेस को अपने संगठन में भी इन मूल्यों को प्रभावी रूप से लागू करने की जरूरत होगी। पार्टी के नेतृत्व, संगठनात्मक प्रतिनिधित्व और जमीनी सक्रियता से ही ऐसे संदेशों का वास्तविक असर सामने आ सकता है।
नीतीश कुमार पर निशाना, समाजवादी विरासत की चर्चा
कांग्रेस अध्यक्ष ने बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार पर जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों से दूर जाने का आरोप लगाया। इस बयान के जरिए खरगे ने बिहार की समाजवादी राजनीति की विरासत को भी मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ने की कोशिश की।
जेपी और लोहिया के विचार बिहार की राजनीति में लंबे समय से वैचारिक बहस का हिस्सा रहे हैं। खरगे का यह हमला उन मतदाताओं और राजनीतिक वर्गों को संबोधित करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है, जो समाजवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय को राजनीतिक नेतृत्व की कसौटी मानते हैं।
इस रणनीति के जरिए कांग्रेस भाजपा के साथ-साथ उसके सहयोगियों की वैचारिक प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े करना चाहती है। हालांकि, इन मुद्दों के सहारे बिहार में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए कांग्रेस को लगातार संवाद और संगठनात्मक प्रयास करने होंगे।
श्रीकृष्ण सिंह की विरासत से कांग्रेस को कितनी ताकत मिलेगी?
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती का मंच कांग्रेस को अपनी विचारधारा और राजनीतिक प्राथमिकताओं को सामने रखने का अवसर देता है। लेकिन किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की विरासत का उल्लेख अपने आप में चुनावी समर्थन की गारंटी नहीं बन सकता।
बिहार में भाजपा के खिलाफ आक्रामक बयान देना और उस विरोध को गांवों, कस्बों तथा स्थानीय राजनीतिक मुद्दों तक पहुंचाना अलग-अलग चुनौतियां हैं। कांग्रेस के सामने अपने संगठन को सक्रिय करने, स्थानीय नेतृत्व को मजबूत बनाने और जनता के बीच भरोसा कायम करने की जरूरत है।
खरगे ने अपने भाषण में चुनावी पारदर्शिता, सामाजिक न्याय और वैचारिक संघर्ष जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। अब इन मुद्दों को लगातार राजनीतिक अभियान में बदलना बिहार कांग्रेस के नेतृत्व की बड़ी परीक्षा होगी। पार्टी इन सवालों को जनता से कितना जोड़ पाती है और अपने समर्थन आधार का कितना विस्तार कर पाती है, इसी से उसकी रणनीति की सफलता का आकलन होगा।
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