महुआ से बदलेगी ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी? झारखंड के 11 अभयारण्यों में नई योजना
- By rakesh --
- 26 Oct 2026 --
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जमशेदपुर। झारखंड के जंगलों में प्रचुर मात्रा में मिलने वाला महुआ अब ग्रामीण महिलाओं की आमदनी बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम बनेगा। राज्य के वन विभाग ने महुआ से तैयार खाद्य उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने के उद्देश्य से महुआ कैफे खोलने की योजना बनाई है। इस पहल के तहत जमशेदपुर स्थित दलमा वन्यजीव अभयारण्य में भी जल्द महुआ कैफे शुरू करने की तैयारी है।
वन विभाग की योजना चरणबद्ध तरीके से राज्य के सभी 11 वन्यजीव अभयारण्यों में ऐसे कैफे स्थापित करने की है। यहां स्थानीय महिलाओं और युवतियों को महुआ से विभिन्न खाद्य उत्पाद तैयार करने, उनकी पैकेजिंग करने और बिक्री से जोड़ने पर जोर दिया जाएगा।
बेतला में सफल प्रयोग के बाद दलमा में तैयारी
झारखंड के मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी), रांची, एसआर नटेस के अनुसार, राज्य के जंगलों में महुआ के पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हैं। हर साल महुआ का पर्याप्त उत्पादन होता है, लेकिन जागरूकता, प्रशिक्षण और संसाधनों की कमी के कारण इसका व्यावसायिक उपयोग सीमित रहा है। वन विभाग अब इसी संभावनाशील वन उपज को ग्रामीण आजीविका से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है।
इस पहल की शुरुआत पलामू टाइगर रिजर्व के बेतला क्षेत्र में की जा चुकी है। वहां स्थानीय महिलाओं और युवतियों को महुआ से खाद्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण के बाद उन्हें बांस से बने कैफे स्टॉल उपलब्ध कराए गए, जहां स्व-सहायता समूह अपने उत्पाद बेच रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बेतला में इन कैफे के माध्यम से महिला समूह रोजाना चार हजार रुपये से अधिक की कमाई कर रहे हैं। इसी मॉडल के अनुभव के आधार पर अब दलमा और दूसरे अभयारण्यों में भी महुआ कैफे स्थापित करने की तैयारी है।
महुआ के लड्डू से कुकीज तक मिलेंगे कई उत्पाद
महुआ कैफे में पर्यटकों को पारंपरिक स्वाद के साथ नए तरह के खाद्य उत्पाद भी उपलब्ध कराने की योजना है। प्रस्तावित मेनू में महुआ के लड्डू, टॉफी, हलवा, कुकीज, बिस्कुट और केक जैसे उत्पाद शामिल हैं। इसके अलावा महुआ की विशेष चाय, मीठा सिरप, शरबत और जैम भी बेचे जाएंगे।
कैफे में महुआ और रागी से बनी पौष्टिक रोटी तथा एनर्जी पाचक जैसे उत्पाद भी उपलब्ध कराने की योजना है। इससे महुआ को केवल पारंपरिक वन उपज के रूप में नहीं, बल्कि विविध खाद्य उत्पादों के लिए उपयोगी कच्चे माल के रूप में पहचान दिलाने में मदद मिल सकती है।
महिलाओं को संग्रहण से बिक्री तक मिलेगा काम
महुआ कैफे योजना का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय महिलाओं और युवतियों को रोजगार तथा स्वरोजगार से जोड़ना है। इसके तहत महुआ संग्रहण, खाद्य उत्पाद तैयार करने, आधुनिक पैकेजिंग और ग्राहकों तक उत्पाद पहुंचाने जैसे कामों में उनकी भागीदारी बढ़ाई जाएगी।
स्व-सहायता समूहों के माध्यम से कैफे संचालित होने पर महिलाओं को सामूहिक रूप से कारोबार करने का अवसर मिल सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ परिवारों की आमदनी बढ़ाने की संभावनाएं भी बनेंगी।
झारखंड के इन 11 अभयारण्यों में खुलेंगे महुआ कैफे
वन विभाग की प्रस्तावित योजना में झारखंड के 11 वन्यजीव अभयारण्यों को शामिल किया गया है। इनमें दलमा वन्यजीव अभयारण्य, हजारीबाग वन्यजीव अभयारण्य, कोडरमा वन्यजीव अभयारण्य, लावालौंग वन्यजीव अभयारण्य और महुआडांड़ भेड़िया अभयारण्य शामिल हैं।
इसके अलावा पलामू वन्यजीव अभयारण्य, पालकोट वन्यजीव अभयारण्य, पारसनाथ वन्यजीव अभयारण्य, टोपचांची वन्यजीव अभयारण्य, उधवा झील पक्षी अभयारण्य और गौतम बुद्ध वन्यजीव अभयारण्य में भी महुआ कैफे खोलने की योजना है।
इस पहल से वन संपदा के बेहतर उपयोग, महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण रोजगार को एक साथ बढ़ावा देने की उम्मीद है। यदि योजना निर्धारित तरीके से आगे बढ़ती है, तो महुआ झारखंड के स्थानीय उत्पादों को नई बाजार पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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